सन 1840 में तत्कालीन मेवाड राज्य के समय उदयपुर से चित्तोड़ जाने के लिए बनने वाली कच्ची सड़क के निर्माण में बागुन्ड गाँव में बाधा बन रहे बबूल के बृक्ष को काटकर खोदने पर वहा से भगवान् कृष्ण की सांवलिया स्वरुप तीन प्रतिमाएं निकली।
संयोग की बात है कि भादसोड़ा एवं मण्डफिया में मंदिर बनने के बाद भी प्रतिमाओं का मूल उदगम स्थान अविकसित ही रहा। इस जगह एक चबूतरे पर 5'x4' आकर का नन्हा सा मंदिर वर्षों तक अनचीन्हा रहा। 1961 में श्री सांवलिया जी प्रेरणा पाकर श्री मोतीलालजी मेहता, अपने सहयोगियों स्व. सर्वश्री दीपचंदजी तलेसरा, श्री डाडमचन्दजी चोरडिया, श्री नारायणजी सोनी व श्री मिट्ठालालजी ओझा के साथ इस कार्य में पूरी तरह लग गए।
वह समय आर्थिक दृष्टि से बहुत कठिनाई का था। लोगों को रूपया आसानी से उपलब्ध नहीं होता था पर मेहताजी ने हार नहीं मानी। उस समय जिससे जो बन पड़ा उससे वह लिया गया, पत्थर विक्रेताओं से पत्थर दान में लिए, छत के लिए पट्टीवालों से पट्टीया लीं।
शनै-शनै प्राकट्य स्थल मंदिर आकर लेने लगा. भविष्य को ध्यान में रखते हुए मंदिर के धरातल को 12 फुट ऊँचा बनाया गया। 1978 में विशाल जनसमूह की उपस्थिति में मंदिर पर ध्वजारोहण किया गया। 1961 से मंदिर के निर्माण,विस्तार व सोंदर्यकरण का जो कार्य शुरू हुआ है,वह आज तक चालू है। राष्ट्रीय राजमार्ग पर इस स्थल पर अब एक अत्यंत ही नयनाभिराम एवं विशाल मंदिर बन चूका है। 36 फुट ऊँचा एक विशाल शिखर बनाया गया है जिस पर फरवरी,2011 में स्वर्णजडित कलश व ध्वजारोहण किया गया।
शोभायात्राओं का संगम
भगवान को स्नान कराते पुजारी जी
शोभायात्रा
मेले में आनंद लेते श्रद्धालु
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